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Monday, February 23, 2015

A letter from General Category Student

एक सामान्य वर्ग के गरीब छात्र
का मोदी जी के नाम खुला ख़त....
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी.....
मै एक सामान्य वर्ग का छात्र हूँ , मेरे पिता का देहांत हो जाने की वजह से मेरी माँ को घर चलाने में बहुत दिक्कतें आयीं। मैंने अपने गाँव के सरकारी स्कूल फिर कॉलेज में पढाई की। सरकारी स्कूल की फीस तक जुटाने में हमे हमेशा दिक्कत होती थी जबकि मैंने देखा की कुछ वर्ग विशेष के बच्चो को, आर्थिक रूप से संपन्न होने बावजूद भी, फीस माफ़ थी और वजीफा भी मिला करता था। 
मै पढ़ाई में अच्छा था। इंटरमीडिएट पास करने के बाद मैंने मेडिकल फील्ड चुना। एंट्रेंस एग्जाम के लिए फॉर्म खरीदा 650 रुपये का जबकि सौरभ भारती नाम के मेरे दोस्त को वही फॉर्म 250 का मिला। उसके पिता डॉक्टर हैं। एंट्रेंस एग्जाम का रिजल्ट आया। सौरभ भारती का नंबर मेरे नंबर से काफी कम था, पर उसे सिलेक्शन मिल गया, मुझे नहीं। 
अगले साल मै भी सेलेक्ट हुआ। मैंने देखा की बहुत से पिछड़े जाति के लोग, अनुसूचित जाति के जनजाति के लोग जो हर मामले में मुझसे कहीं ज्यादा सुविधासंपन्न हैं, उनको मुझसे बहुत कम फीस देनी पड़ रही है। उनके स्कॉलरशिप्स भी मुझे मिल रही स्कालरशिप से बहुत ज्यादा है और उनका हॉस्टल फीस भी माफ़ है। 
इंटर्नशिप बीतने के बाद मुझे लगा की अब हम सब एक लेवल पर आ गए, अब कम्पटीशन बराबर का होगा। पर मै गलत था। पोस्टग्रेजुएशन के लिए प्रवेश परीक्षा में मेरा सहपाठी प्रकाश पासवान मुझसे काफी कम नंबर पाते हुए मुझसे बहुत अच्छी ब्रांच उठाता है।
प्रधानमंत्री जी ऐसा नौकरी के वक़्त भी होगा।
प्रधानमंत्री जी मैंने आजतक कोई भेदभाव नहीं किया। 
किसी को मंदिर में जाने से नहीं रोका, किसी को कुएं से पानी पीने से नहीं रोका, किसी से छुआछूत नहीं की, अरे हम सब लोग तो साथ साथ एक थाली में खाना खाते थे , इतिहास में किसने किया, क्या किया उस बात के लिए मै दोषी क्यों? मुझसे क्यूँ बदला लिया जा रहा है? मै तो खुद जीवन भर से जातीय भेदभाव का शिकार होता रहा हूँ। क्या ऐसे में मैं जातिवाद से दूर हो पाऊंगा? ऐसा मै इसलिए पूछ रहा हूँ की जातिवाद ख़त्म करने की बात हो रही है तो जाति के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण के होते हुए जातिवाद ख़तम हो पायेगा? 
मुझे कतई बुरा नहीं लगेगा अगर किसी गरीब को इसका फायदा हो, लेकिन मैंने स्वयं देखा है की इसका 95 प्रतिशत लाभ उन्ही को मिलता है जिन्हें इसकी जरुरत नहीं है। शिक्षित वर्ग से उम्मीद की जाती है कि वो समाज को बटने से रोके। जातिगत आरक्षण खुद शिक्षित समाज को दो टुकड़े में बाँट रहा है।
प्रधानमंत्री जी कम से कम इस बात की विवेचना तो होनी चाहिए की आरक्षण का कितना फायदा हुआ और किसको हुआ? अगर इसका लाभ गलत लोगों को मिला तो सही लोगों तक पहुचाया जाना चाहिए। और अगर लाभ नहीं हुआ तो इसका क्या फायदा, और अगर फायदा हुआ तो फिर 67 सालों बाद भी इसकी जरुरत क्यों बनी हुयी है ?
प्रधानमंत्री जी 'जाति के आधार पर दिया जा आरक्षण' साफ़ साफ़ योग्यता का हनन है, इससे हर वर्ग की गुणवत्ता प्रभावित हुयी है। अगर जातिगत आरक्षण इतना ही जरुरी है तो फ़ौज में, खेलों में, राजनीतिक पार्टियों के अध्यक्ष के पद में, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के पदों के लिए आरक्षण का प्रावधान क्यों नहीं किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री जी हमने आपको बहुत ही साहसिक फैसले लेते हुए देखा है। शुद्ध राजनीति से प्रभावित इस मुद्दे पर भी साहसिक फैसले की जरुरत है। उम्मीद सिर्फ आपसे है।
आशा है की ये पत्र कभी आप तक पहुचे तो आप 'साहसी' बने रहेंगे।
आपके देश का एक गरीब सामान्य वर्ग का छात्र....!
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Monday, January 26, 2015

FA-4 Tool 5th Class ENGLISH-Hindi

Tuesday, January 6, 2015

Kalyug

श्रीकृष्ण कहते हैं- "तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ।
मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।" पाँचों भाई वन में गये। 

  • युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है। यह देखकर आश्चर्य का पार न रहा। 
  • अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है यह भी आश्चर्य है !
  • भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।
  • सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।
  • पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आती और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई।
पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं ! शाम
को वे श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-
अलग दृश्यों का वर्णन किया।

  • युधिष्ठिर कहते हैं- "मैंने दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न रहा।" तब श्री कृष्ण कहते हैं- "कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे। बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इससे तुम पहले राज्य कर लो। 
  • अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। इसी प्रकार कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे जो बड़े- बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाये। "संस्था" के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाये। हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ? चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी। परधन परमन हरन को वैश्या बड़ी चतुर। ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा। 
  • भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है। कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा। बालकों के लिए इतनी ममता करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा। ""किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे....किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ?"" इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोहमाया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो  जाएगा। अंत में बिचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है। तुम्हारी आत्मा-परमात्मा की अमानत है ।  तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस ! 
  • सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली ! कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं। दूसरी और मौज-मौज में, शराब, कबाब, फैशन और व्यसन में पैसे उड़ा देंगे। किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।
  • पाँचवा आश्चर्य यह था कि एक बड़ी चट्टान पहाड़ पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई। कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा। यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा। किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे मनुष्य जीवन का पतन होना रूक जायेगा.
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Saturday, January 3, 2015

Samaas (Compound) (समास)

समास -
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से नए शब्द बनाने की क्रिया को समास कहते हैं !
सामासिक पद को विखण्डित करने की क्रिया को विग्रह कहते हैं !
समास के छ: भेद हैं -
1- अव्ययीभाव समास - जिस समास में पहला पद प्रधान होता है तथा समस्त पद अव्यय का काम करता है , उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं !जैसे - 

      ( सामासिक पद )                     ( विग्रह )
1.      यथावधि                          अवधि के अनुसार    
2.      आजन्म                           जन्म पर्यन्त 
3.      प्रतिदिन                           दिन -दिन 
4.      यथाक्रम                           क्रम के अनुसार 
5.      भरपेट                              पेट भरकर 
2- तत्पुरुष समास -  इस समास में दूसरा पद प्रधान होता है तथा विभक्ति चिन्हों का लोप हो जाता है !  तत्पुरुष समास के छ: उपभेद विभक्तियों के आधार पर किए गए हैं
1. कर्म तत्पुरुष 
2. करण तत्पुरुष
3. सम्प्रदान तत्पुरुष 
4. अपादान तत्पुरुष 
5. सम्बन्ध तत्पुरुष 
6. अधिकरण तत्पुरुष 
- उदाहरण इस प्रकार हैं - 
        ( सामासिक पद )                   ( विग्रह )                           ( समास )

1. कोशकार                          कोश को करने वाला               कर्म तत्पुरुष 
2. मदमाता                          मद से माता                         करण तत्पुरुष 
3. मार्गव्यय                    मार्ग के लिए व्यय                 सम्प्रदान तत्पुरुष 
4. भयभीत                       भय से भीत                         अपादान तत्पुरुष 
5. दीनानाथ                     दीनों के नाथ                        सम्बन्ध तत्पुरुष 
6. आपबीती                 अपने पर बीती                      अधिकरण तत्पुरुष                           
3- कर्मधारय समास -  जिस समास के दोनों पदों में विशेष्य - विशेषण या उपमेय - उपमान सम्बन्ध हो तथा दोनों पदों में एक ही कारक की विभक्ति आये उसे कर्मधारय समास कहते हैं !  जैसे :-
       ( सामासिक पद )                 ( विग्रह )
1.      नीलकमल                     नीला है जो कमल
2.      पीताम्बर                       पीत है जो अम्बर
3.      भलामानस                    भला है जो मानस
4.      गुरुदेव                           गुरु रूपी देव
5.      लौहपुरुष                       लौह के समान ( कठोर एवं शक्तिशाली  ) पुरुष
4-  बहुब्रीहि समास -  अन्य पद प्रधान समास को बहुब्रीहि समास कहते हैं !इसमें दोनों पद किसी अन्य अर्थ को व्यक्त करते हैं और वे किसी अन्य संज्ञा के विशेषण की भांति कार्य करते हैं ! जैसे -
       ( सामासिक पद )               ( विग्रह )
1.      दशानन                        दश हैं आनन जिसके  ( रावण )
2.      पंचानन                        पांच हैं मुख जिनके    ( शंकर जी )
3.      गिरिधर                        गिरि को धारण करने वाले   ( श्री कृष्ण )
4.      चतुर्भुज                        चार हैं भुजायें जिनके  ( विष्णु )
5.      गजानन                       गज के समान मुख वाले  ( गणेश जी )
5-  द्विगु समास -  इस समास का पहला पद संख्यावाचक होता है और सम्पूर्ण पद समूह का बोध कराता है ! जैसे -       
        ( सामासिक पद )                  ( विग्रह )
1.        पंचवटी                           पांच वट वृक्षों का समूह
2.        चौराहा                            चार रास्तों का समाहार
3.        दुसूती                             दो सूतों का समूह
4.        पंचतत्व                          पांच तत्वों का समूह
5.        त्रिवेणी                           तीन नदियों  ( गंगा , यमुना , सरस्वती  ) का समाहार
6-  द्वन्द्व समास -  इस समास में दो पद होते हैं तथा दोनों पदों की प्रधानता होती है ! इनका विग्रह करने के लिए  ( और , एवं , तथा , या , अथवा ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है !    जैसे -
          ( सामासिक पद )                      ( विग्रह )
1.         हानि - लाभ                        हानि या लाभ
2.         नर - नारी                           नर और नारी
3.         लेन - देन                           लेना और देना
4.         भला - बुरा                          भला या बुरा

5.         हरिशंकर                             विष्णु और शंकर 
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Thursday, December 4, 2014

50 रूपये उधार

एक व्यक्ति office में देर रात तक काम करने के बाद थका – हारा घर पहुंचा. देखा कि उसका पांच वर्षीय बेटा सोने की बजाये उसका इंतज़ार कर रहा है.
अन्दर घुसते ही बेटे ने पूछा —“ पापा , क्या मैं आपसे एक question पूछ सकता हूँ ?”
आप एक घंटे में कितना कमा लेते हैं ?”
बेटा – “ मैं बस यूँही जानना चाहता हूँ . Pleaseपिता ने उत्तर दिया . “ इससे तुम्हारा क्या लेना देना …”
पिता ने उसकी तरफ देखते हुए कहा , “ 100 रुपये .”
“ पापा क्या आप मुझे 50 रूपये उधार दे सकते हैं ?”
इतना सुनते ही वह व्यक्ति आग बबूला हो उठा,
“तो तुम इसीलिए ये फ़ालतू का सवाल कर रहे थे….
चुप –चाप अपने कमरे में जाओ और सो जाओ …
यह सुन बेटे की आँखों में आंसू आ गए … और वह अपने कमरे में चला गया .
आध घंटा बीतने के बाद वह थोडा शांत हुआ, क्योंकि आज से पहले उसने कभी इस तरह से पैसे नहीं मांगे थे. फिर वह उठ कर बेटे के कमरे में गया और बोला,
“क्या तुम सो रहे हो ?”,
“ मैं सोच रहा था कि शायद मैंने बेकार में ही तुम्हे डांट दिया,
“I am sorry….ये लो पचास रूपये .”
उसने अपने बेटे के हाथ में पचास की नोट रख दी .
“Thank You पापा ” बेटा ख़ुशी से पैसे लेते हुए कहा,
और फिर वह अपनी आलमारी की तरफ गया, वहां से उसने ढेर सारे सिक्के निकाले और उन्हें गिनने लगा
“ जब तुम्हारे पास पहले से ही पैसे थे तो तुमने मुझसे और पैसे क्यों मांगे ?”
“ क्योंकि मेरे पास पैसे कम थे,
“ पापा अब मेरे पास 100 रूपये हैं . क्या मैं आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ ?
Please आप ये पैसे ले लोजिये और कल घर जल्दी आ जाइये, मैं आपके साथ बैठकर खाना खाना चाहता हूँ.”
दोस्तों, इस तेज रफ़्तार जीवन में हम कई बार खुद को इतना busy कर लेते हैं कि उन लोगो के लिए ही समय नहीं निकाल पाते जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा importance रखते हैं.
इसलिए हमे अपने माँ- बाप, जीवन साथी, बच्चों के लिए समय निकालें, वरना एक दिन हमें भी अहसास होगा कि हमने छोटी-मोटी चीजें पाने के लिए कुछ बहुत बड़ा खो दिया
with thanks from http://anmolvachan.in/
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प्रायश्चित

एक बार कुछ विद्यार्थी रसायन विज्ञानं प्रयोगशाला में कुछ प्रयोग कर रहे थे. सभी विद्यार्थी अपने अपने प्रयोगों में व्यस्त थे कि अचानक एक लड़के की परखनली से तेज बुलबुला उठा और उसकी छिट्कियाँ सामने प्रयोग कर रही लड़की की आँखों में चला गया.
पूरी प्रयोगशाला में हाहाकार मच गया, सभी खूब परेशांन हुए, आनन फानन में उस लड़की को अस्पताल पहुँचाया गया, वहाँ डाक्टरों ने बताया कि वो अपनी आँखें खो चुकी है. ये सुन कर उस लड़की के घर वालों ने उस लड़के को कोसना शुरू कर दिया और स्कूल वालों ने उस लड़के को स्कूल से निकाल दिया.
अब वो अंधी लड़की अपनी नीरस ज़िन्दगी बिता रही थी, जो शायद किसी की लापरवाही की वजह से वीरान सी हो गयी थी, अब उस लड़की की ज़िन्दगी में कोई भी रंग कोई मायने नहीं रखता था. घर वाले भी वक़्त बेवक्त उस लड़के को कोसते रहते थे जिसने उनकी लड़की की ज़िन्दगी खराब कर दी थी. आज कल के ज़माने में तो किसी के सामने हूर परी भी बैठा दो तो भी लड़के वालों को उससे भी ज्यादा खूबसूरत चाहिए होती है. फिर उस बिचारी की वीरान ज़िन्दगी में रंग भरने की बात सोच पाना भी असंभव सा था. खैर वक़्त बीतता गया और उस लड़की को उस वीराने की आदत हो गयी. क्योंकि अब उसकी ज़िन्दगी में कही से भी उजाला आने की कोई गुंजाइश नहीं थी.
अचानक एक दिन एक बड़े इंजीनियर का रिश्ता उस अंधी लड़की के घर आया. यही नहीं लड़का खुद उसके घरवालों से उसका हाथ मांगने अपने माँ बाप के साथ आया था. घर वाले मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे कि बैठे बिठाये उन्हें अपनी अंधी लड़की के लिए लड़का मिल गया लेकिन लड़की इस बात से काफी दुखी थी. शायद इसलिए कि वो किसी की ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती थी. इसलिए उसने लड़के को अन्दर बुलाया और बोली कि मैं अंधी हूँ आपके घर का कोई काम मैं नहीं कर पाउंगी, आपको मुझसे कोई सुख नहीं मिल पायेगा, आप एक इंजीनियर हैं इसलिये आपको तो एक से बढ़कर एक लड़कियां मिल जायेंगी. आप प्लीज़ अपनी ज़िन्दगी खराब मत कीजिये. इस पर वो लड़का आगे बढ़ा और घुटनों के बल बैठकर लड़की का हाथ पकड़कर बोला :
प्लीज़ तुम इस शादी के लिए हाँ कहके मुझे मेरा प्रायश्चित कर लेने दो, मैं वही हूँ जिसने तुम्हारी ज़िन्दगी वीरान की है और आज मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ. प्लीज़ मना मत करना. ये सुन कर वो लड़की रोने लगती है, ये सोच कर नहीं कि उसकी ज़िन्दगी खराब करने वाला उससे शादी करना चाहता है. बल्कि ये सोच कर कि इस दुनिया में ऐसे लोग भी है जो अपनी गलती को स्वीकारना जानते हैं ।।
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